अगर मैं पंछी होता,
विचरण करता नील गगन में,
सीख लेता उन्मुक्त रहना
बचे हुए जीवन में।
अगर मैं झरना होता,
झर-झर बहता रहता,
निरंतर मेहनत से मंजिल तक जाना
सीख लेता यह मंत्र।
अगर मैं किरण होता,
नभ से आता रोज़ सवेरे,
सीख लेता जग को जगाना,
करते दूर अँधेरे।
अगर मैं वर्षा होता,
बरसकर करता खेत सिंचाई,
सीख लेता नश्वर जीवन में
करना सबकी भलाई।
अगर मैं वायु होता,
करता सब प्राणियों की रक्षा,
सीख लेता मरने से पहले
करना कुछ अच्छा।
अगर मैं पर्वत होता,
करता दुनिया को इशारे,
सीख लेता अडिग रहना
बिना किसी के सहारे।
अगर मैं अंबर होता,
खुद पर संसार बसाता,
करता खूब मानव की सेवा,
कभी नहीं पछताता।
. धर्मेन्द्र कुमार
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