उम्मीद का सफ़र
जख्म दिल के कुरेदने से,
दर्द दिल का ही बढ़ता है।
दर्द देने वालों का कब,
कुछ भला बिगड़ता है।
जख्म जो पुराने भर गए,
दबे हुए उन घावों को
दबा ही रहने दो।
मन में बस यही भाव रहे—
फिर कोई नया जख्म न मिले,
निष्कंटक जीवन आगे चले।
हो पड़ा यदि कोई भारी पत्थर,
राहों के बीच कहीं;
तोड़कर हटाना संभव न हो,
तो राह बदल लो वहीं।
व्यर्थ उसे मन में रखकर
यूँ ही न कुढ़ते रहो।
-देवेंद्र भण्डारी
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