जो गुज़रा तेरे दर से वो दीवाना ही रहेगा,
मिला जो झोलियों में ठोकरें खाना ही रहेगा।
बदल सकती नहीं दुनिया कभी अपनी हक़ीक़त को,
अफ़साना लाख सच समझो, वो अफ़साना ही रहेगा।
वो महफ़िल हो कि तन्हाई, उसे आराम कैसा,
जो अपनों के ही बीच अब हरदम बेगाना ही रहेगा।
तेरी चौखट से जो लौटा वो कब आबाद हो पाया,
यक़ीनन उम्र भर वो 'देव' ग़म खाना ही रहेगा।
-देवेन्द्र पंत
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