दर्द-ए-दिल और दर्द-ए-गुदा:
दोनों ही मर्ज ऐसे हैं,
जो चुपचाप रुलाते हैं,
बहते आँसू चीज हैं क्या,
दोनों ही प्राण सुखाते हैं।
शुरुआत दोनों की,
बहुत ही चुपके से होती है,
मगर जब बात बढ़ जाए,
तो हर उम्मीद खोती है।
प्रेम का दर्द तीखा है,
आदमी छटपटाता है,
उधर पाइल्स कहाँ कम है,
बैठना तक छुड़ाता है।
एक बाहर से भीतर आये,
दूसरा भीतर से बाहर जाए,
दोनों के तरकश भरे हुए,
अर्जुन तक भी घबरा जाए I
प्रेम में आशिक अक्सर
रातों को जागता है,
और पाइल्स का सताया,
सुबह उठने से भागता है।
दोनों ही सूरतों में
इंसान चैन खोता है,
कोई तकिए पे सिर रख,
कोई सीट पे रोता है।
दिल का घाव तो फिर भी
ज़माने को दिखा दें हम,
शायरी में पिरोकर,
अपनी दास्तान सुना दें हम।
मगर उस गुप्त पीड़ा का
कोई साझीदार नहीं होता,
यह वो जख्म है जिसका,
सरे आम इज़हार नहीं होता।
दवा दोनों की मुश्किल है,
सब्र ही एक चारा है,
एक ने मजनू को लूटा,
तो दूजे ने,
अच्छे-अच्छों को पछाड़ा है।
इसलिए ऐ दोस्त,
दोनों से कहना मुझे माफ करना,
जरूरी है कि दिल और पेट,
हमेशा साफ रखना।
एक ही काफी है, मगर
जिसे दोनों लगा हो,
सोचो उसकी जिंदगी की,
क्या दशा हो?
-देवेन्द्र पंत
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