कभी-कभी मन करता है
कि बस एक बैग उठाऊँ,
फोन बंद करूँ
और कहीं बहुत दूर चला जाऊँ।
ऐसी जगह,
जहाँ कोई मुझे मेरे पुराने नाम से न बुलाए,
जहाँ किसी को पता न हो
कि मैं पहले कैसा था।
क्योंकि आदमी एक दिन में नहीं बदलता,
वह थोड़ा-थोड़ा बदलता है—
किसी के व्यवहार से,
किसी की बेरुखी से,
और कभी-कभी अपने ही फैसलों से।
चरित्र बदलता है तो इंसान वही नहीं रहता,
स्वभाव बदलता है तो रिश्ते भी पुराने नहीं रहते।
और सबसे दुख की बात यह है—
कई बार हमें बदलने का पता भी
तब चलता है,
जब हम खुद से ही मिलने में झिझकने लगते हैं।
शायद इसलिए दूर जाना चाहता हूँ,
किसी से भागने के लिए नहीं—
बस उस आदमी को ढूँढने के लिए
जो कभी मैं हुआ करता था।
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