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धर्मो रक्षति रक्षितः

                
                                                         
                            स्वीकारो अपने कर्म को,
                                                                 
                            
अपनाओ अपने धर्म को,
मत लांघो सीमा पापों की,
बिठाओ अपने भीतर थोङी शर्म को।

यदि शेष है थोङी सी मानवता,
तो रोक दो इन कुकर्मों को,
सबका हिसाब यहीं होगा,
बंद करो इन अधर्मों को।

मत मारो इन जीवों को,
जीवन जीने का हक इनको भी है,
दुख बङा सिर्फ तेरा ही नहीं,
दुख बङा इनका भी है।

इक बच्चे को मां से दूर किया,
मां के गर्भ को तूने मार दिया,
वो फूट-फूटकर रोते रहे,
तुम नोंच-नोंचकर खाते रहे।

मां की कोख को तूने सूना किया,
नारी से दुष्कर्म किया,
बोया बीज जब उगकर आया,
तो बेटी को छोड़ ,
बेटों को बचाने का ऐलान किया।

बुद्धि भृष्ट हो चुकी है मानव की,
ये सेना बन चुकी है दानव की।

करनी हादसे में तब्दील हुई,
दुष्कर्म बन गया हत्याकांड,
जीवों ने भी प्रतिशोध लिया,
सब कष्टों ने तुझको घेर लिया।

अब जो बोया है,वो काटेगा,
कोई कष्ट न तेरे बांटेगा,
जिन हाँथों से ईश्वर की पूजा की,
उन्ही हाँथों से मां-बाप को तूने मार दिया।

न मां-बाप रहा, न भाई-बहन,
हर रिश्ते में कड़वाहट है,
क्यूँ डरता है तू अभी से,
ये तो तेरे कर्मफल की आहट है।

काल से अपने डर गया तू,
प्रभू शरण में आया है,
मन्नत मांगी है उनसे तूने,
हज़ारों का चढ़ावा चढ़ाया है।

अरे! क्या ही देगा तू उनको,
जब उनसे ही तूने पाया है,
चढ़ाना है तो अहम चढ़ाओ,
जो कूट-कूट के समाया है।

वक्त रहते संभल जा!
नहीं तो सर्वनाश होगा,
धर्म रक्षक नारायण हैं,
भयावह तेरा विनाश होगा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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