तेरे बग़ैर थमी है ज़िन्दगी जैसे,
एक मुलाक़ात लाज़मी है जैसे।
तू नहीं तो कोई कमी नहीं लेकिन,
फिर भी लगती है कोई कमी जैसे।
तेरी पलकें झुकी झुकी क्यों हैं,
और आंखों में है एक नमी जैसे।
सबब कुछ तो है तिरी उदासी का,
और मिज़ाज भी है दरहमी जैसे।
तू मेरी मोहब्बत पर यक़ीन कर,
इस की तासीर है मरहमी जैसे।
कहीं ख़ुशी और कहीं पर ग़म है,
यही तो है रस्म-ए-आलमी जैसे।
साथ हैं हम तो सुहाना है सफ़र,
राहों में बिखरी है रौशनी जैसे।
"शमीम" हमनफ़स, हमदम हैं हम,
और तू ही है मेरी महरमी जैसे।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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