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रस्मे-दुनिया

                
                                                         
                            रस्मे-दुनिया निभाता जा रहा हूँ,
                                                                 
                            
ग़म में भी मुस्कुराता जा रहा हूँ।

नहीं ग़म-ख़्वार है कोई भी मेरा,
रंजो-ग़म को छुपाता जा रहा हूँ।

न रहबर है न मंज़िल का पता है,
रहगुज़र ख़ुद बनाता जा रहा हूँ।

कौन अपना है कौन है पराया,
सभी को आज़माता जा रहा हूँ।

ज़ुल्मते-शब मिटाना चाहता हूँ,
चराग़े-दिल जलाता जा रहा हूँ।

"शमीम" तल्ख़ जो एहसास मिले,
उन सभी को भुलाता जा रहा हूँ।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

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