मोहब्बत के वो फ़साने नहीं हैं,
पहले जैसे वो ज़माने नहीं हैं।
तिजारत हो गया है प्यार अब,
लैला-मजनूं से दीवाने नहीं हैं।
हैसियत गर नहीं तो चाहत नहीं,
मुफ़लिसों के तो याराने नहीं हैं।
मोहब्बत और फिर तर्के-मोहब्बत,
कोई नये ये अफ़साने नहीं हैं।
जिस्म की भूख इनका है मक़सद,
पाक-ओ-साफ दोस्ताने नहीं हैं।
शमा की लौ में जो जल जाएं ऐसे,
जो पागल हों वो परवाने नहीं हैं।
कभी नज़रों से जो पिलाते थे,
"शमीम" अब वो मयख़ाने नहीं हैं।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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