इश्क़ मसर्रत का सिलसिला है मेरे लिए,
तेरी आँखों में कुछ तो लिखा है मेरे लिए।
तुझ को पाकर सारा जहाँ मिला मुझ को,
ग़ुमाँ है ख़ुद पर मुझे तू बना है मेरे लिए।
इनके साए में तमाम उम्र गुज़र जाएगी,
मेरा ठिकाना ज़ुल्फ़ों की घटा है मेरे लिए।
मैंने जो ख़्वाब सजाए उनकी ताबीर है तू,
तू मंज़िल है और तू ही रास्ता है मेरे लिए।
साथ हम हैं तो आलम-ए-पुर-बहार है हर सू,
चमन भी जैसे लाला-ज़ार हुआ है मेरे लिए।
"शमीम" ज़िंदगी मेरी तेरे ही दस्त-ए-निगर है,
तू हमसफ़र है; मेरे जहाँ में जिया है मेरे लिए।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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