तू ने पाया है जो ऐसा कहीं शबाब नहीं,
हुस्न-ओ-जमाल तुझ सा बेहिसाब नहीं।
रुख़े-रौशन को तेरे जब से देखा है हमने,
हसीं चेहरे का क़सम से कोई जवाब नहीं
तेरी आँखों तो हैं मय के छलकते प्याले,
बादा-ख़ाने में ऐसी उम्दा तो शराब नहीं।
तू वही है जिस को ख़्वाब में सजाया था,
ज़हे-नसीब तू रूबरू है कोई ख़्वाब नहीं।
इनायत है तेरी नज़रों का इंतिख़ाब हूँ मैं,
इस से उम्दा मेरे लिए कोई ख़िताब नहीं।
"शमीम" शरह-ए-जुनूँ मेरी बस इतनी है,
साथ गर तू है तो कोई भी इज़्तिराब नहीं।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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