थोड़ी ज़मीँ और थोड़ा आसमान चाहिए,
ज़िन्दा रहें दिलों में वो इम्कान चाहिए।
कितने ही हुनरमंद इस दुनिया में आते हैं,
पहचाने हुनर को वो क़द्रदान चाहिए।
कुछ नक्श-ए-पा ऐसे बनाने चाहिए हमें,
मंज़िल तलक पहुंचाएं वो निशान चाहिए।
हर रंग और बू के फूल खिल सकें जहां,
ऐसा ही मुझ को मेरा गुलिस्तान चाहिए।
नफ़रत न हो दिलों में जज़्ब-ए-मोहब्बत हो,
अम्नो-अमाँ क़ायम हो वो जहान चाहिए।
ख़ुद के लिए जीते रहे तो क्या जिए "शमीम",
औरों के लिए जीने का अरमान चाहिए।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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