आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वो चांद नहीं आता है

                
                                                         
                            क्यों पूनम का वो चांद नहीं आता है?
                                                                 
                            
क्यों पपीहा अब वो गीत नहीं गाता है?

कहाँ जाड़ों की सोंधी धूप की मुस्कान गयी?
क्यों भौरा फूल में वो पराग नहीं पाता है?

हर ख्वाब हकीकत था, खयाल रुबरु था,
आज हकीकत पर एतबार नहीं आता है।

चूड़ियों की खन खन, पग पायलों की छमछम,
क्यों अब सावन, वो मल्हार नहीं गाता है?

कुछ तो था ,जो आज मेरे पास नहीं,
क्यों यह जहान शमशान नजर आता है?

"वो" थे तो पतझड़ भी ,था गंध मकरंद भरा,
अब तो बसन्त बिन बहार चला जाता है।

क्यों पूनम का वो चांद नहीं आता है?
क्यों बसन्त बिन बहार चला जाता है?
-देवेन्द्र सिंह चौहान
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर