कुछ दर्द सुकून बन जाते हैं
कुछ लोग मिले तो लगा,
जैसे बरसों की दुआ मिल गई,
कुछ बिछड़े तो यूँ लगा,
जैसे साँसों से हवा निकल गई।
आँखों में जो ख़्वाब थे,
वक़्त उन्हें पढ़ न सका,
हम जिसे अपना समझते रहे,
वो हमें समझ न सका।
उम्र भर जिसका इंतज़ार रहा,
वो पल कभी मुकम्मल न हुआ,
जिसे पाने की चाहत थी,
उसी से दिल का फ़ासला हुआ।
कुछ रिश्ते मिलकर भी अधूरे रहे,
कुछ दूर होकर भी साथ चले,
कुछ नाम ज़ुबाँ पर न आए,
मगर उम्रभर दिल के पास रहे।
दर्द इतना था कि कह न सके,
और ख़ामोशी इतनी कि सह न सके,
फिर ज़िंदगी ने धीरे से समझाया—
हर ज़ख़्म को मरहम नहीं मिलता,
कुछ ज़ख़्म हमें इंसान बना जाते हैं।
अब न किसी से शिकायत है,
न किसी से कोई सवाल,
जो मिला—उसका शुक्रिया,
जो नहीं मिला—उसका भी ख़याल।
क्योंकि सुकून हमेशा मिलने से नहीं,
कभी-कभी छोड़ देने से मिलता है,
और इंसान तब बड़ा नहीं होता
जब उसे सब कुछ मिल जाए—
बल्कि तब होता है,
जब वह अपने दर्द के बावजूद
किसी और के लिए दुआ करता है।
शायद यही ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत सच है—
कुछ लोग कहानी बनकर चले जाते हैं,
कुछ दर्द कविता बन जाते हैं,
और कुछ अधूरे रिश्ते
हमारी आत्मा को
शांति का अर्थ सिखा जाते हैं।
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