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दिल के ज़ख़्म

                
                                                         
                            दिल के ज़ख़्म..
                                                                 
                            

दिल के ज़ख़्मों को भला दिखाऊँ तो दिखाऊ ,कैसे?
दास्तान-ए-बेरुख़ी सुनाऊँ तो सुनाऊँ कैसे...

वो जो कहती थी, निभाऊँगी साथ ताउम्र तक,
अब उसकी बेवफ़ाई के किस्से सुनाऊँ तो सुनाऊँ कैसे?

वफ़ा के शहर में हम ही गुनहगार ठहरे,
अपनी बेगुनाही का सबूत लाऊँ तो लाऊँ कैसे?

जिसे रूह की तरह अपनी साँसों में बसाया हमने ,
उसकी यादों से यह दिल बचाऊँ तो बचाऊँ कैसे?

मेरे हिस्से में आईं तन्हाइयाँ, उसके हिस्से में महफ़िलें,
अपने नसीब का फ़ैसला सुनाऊँ तो सुनाऊँ कैसे?

वक़्त ने हर मोड़ पर आईना दिखाया मुझको,
अपने ही टूटे हुए चेहरे को छुपाऊँ तो छुपाऊँ कैसे?

अब किसी से शिकायत भी नहीं, कोई गिला भी नहीं,
दिल की ख़ामोशियों को ज़ुबाँ दूँ तो दूँ कैसे?
"मक्ता"
"दीप" दर्द को अल्फ़ाज़ में ढालना ही मुक़द्दर है,
दिल की राख से फिर एक ग़ज़ल बनाऊँ तो बनाऊँ कैसे?

 
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2 महीने पहले

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