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मौन का महाकाव्य: आंसू

                
                                                         
                            जो सिमट जाते शब्दों में, तो बात और होती,
                                                                 
                            
यह सजल वेदना फिर यूं सरेआम न रोती।
तुम ढूंढ रहे हो जिन अक्षरों को मेरी इन पलकों में,
वो भाषाके संकुचित दायरों में नहीं होती।

तभी तो...
यह आंसू,
मेरी आत्मा की सबसे गहन अभिव्यक्ति हैं,
यह शब्दों की पराजय पर,
मौन की सबसे मुखर स्वीकृति है

किताबों के सारे व्याकरण, सारे छंद हार गए,
मेरे भीतर के सैलाब को बांधने में वो शब्द हार ग।

अगर विरह की यह अगन, इन गीतों में ढल जाती,
अगर हृदय की ये व्यथा, वाणी से संभल जाती,
तो भला मैं क्यों रोती?
क्यों इन मोतियों को यूं सरेआम खोती

सत्य तो यही है कि आंसू का कोई अनुवाद नहीं होता
"यह पानी नहीं, यह तो पिघला हुआ वो सच है,
जिसे बोलने का हुनर, दुनिया की किसी भाषा के वश में नहीं है।
जब दर्द का कद बहुत बड़ा हो जाता है,
तब एक आंसू, ज़ुबां की जगह आकर खड़ा हो जाता है।
बहने दो इन्हें, क्योंकि ये मेरी बेबसी का प्रमाण हैं,
ये वो अनकही कविता हैं, जिसके आगे सारे शब्द निष्प्राण हैं।
- दीपक कुमार मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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