आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बुद्धत्व का मौन

                
                                                         
                            हे बोधिसत्व! हे शाक्यमुनि! करुणा के सागर हो अगाध,
                                                                 
                            
तुमने पाई है परम-सिद्धि, विचरो अब इस जग में निर्बाध।
तरु बोधि-तले जब ध्यान लगा, तब चेतन का विस्तार हुआ,
अंतर का मिटा अंधियारा, बाहर भी जय-जयकार हुआ!
मुख-मंडल पर जो तेज सजे, ज्यों निश्छल कोई दर्पण है,
वैराग्य-भाव में लीन हुए, यह कैसा अहं-विसर्जन है!
चंचल मन की लहरें ठहरीं, तृष्णा का टूट गया घेरा,
अंतर में ज्ञान-प्रभा जागी, छँट गया अविद्या-अंधेरा।
यह प्रश्न उठे मन में अक्सर, क्या इसीलिये तुम शांत हुए,
कि पूर्ण रूप से जाग चुके, और सारे संशय भ्रांत हुए?
या परम-शांत तुम हुए प्रथम, तब यह जागृति का भोर हुआ?
जब थमा वासना का झंझा, तब मौन-नाद चहुँ ओर हुआ!
पर सत्य यही, दोनों ही एक, ज्यों दीप और उसकी बाती,
यह शांति जगाती है तुमको, यह जागृति शांति है लाती।
तुम शांत हो क्योंकि जगे हुए, तुम जगे क्योंकि मन शांत हुआ,
जिसने इस रहस्य को जान लिया, उसका हर भरम निशांत हुआ!
नयनों में करुणा की सरिता, अधरों पर स्मित मुस्कान सजी,
ज्यों अंतर्मन की वीणा पर, कोई अनहद सी तान बजी!
हे महाश्रमण! हे बुद्धदेव! यह विश्व विकल, तुमको ध्याए,
तेरी अनंत इस शांति का, बस एक अंश जग में आए!
~ दीपक कुमार मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर