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भूल गए तुम

                
                                                         
                            विवश हो जाता हूँ सोचने को,
                                                                 
                            
जब भी देखता हूँ इन्हें ।
प्रकृति की अनमोल कृति ,
क्या हो गया है तुम्हे !
सभ्यता का विस्तार तुम्हीं से ,
कृषि ,कला, व्यापार तुम्हीं से ।
संस्कृति और समाज तुम्हीं से ,
क्या भूल गए तुम ?
नगर नियोजन और विज्ञान ,
श्रम ,कानून और सामाजिक उत्थान ।
ब्रह्म ,वेद ,वेदांत का ज्ञान ,
तुम्हीं से है ,क्या भूल गए तुम ?
बौद्धिक चेतना का अनन्याधिकार ,
सोंच ,समझ व नये अविष्कार ।
उचित अनुचित के निर्णय की क्षमता ,
तुम्हें क्यों मिला ,क्या भूल गए तुम ?
पर छोड़ो ! क्या बोलें हम ,
तुम तो अब भी असंतुष्ट हो ।
बल ,बुद्धि ,विवेक, क्या नहीं मिला ,
जो तुम एक दूसरे से हीं रूष्ट हो ?
प्राप्त पर्याप्त होने पर भी ,
और अधिक पाने की तृष्णा ।
ऊंच नीच अमीर गरीब ,
मानव का मानव से घृणा ।।
मंजिल कहाँ थी पहुंचें कहाँ हम ,
जरा ठहरकर फिर सोचें हम ,
मानव जीवन का उद्देश्य क्या रहा ,
आओ बैठो ,समीक्षा करें हम ।।
-दीप शिखा पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

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