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क्रांति की मशाल

                
                                                         
                            जो सबसे आगे है
                                                                 
                            
ज़रूरी नहीं
उसके हाथ में बंदूक हो।
हो सकता है
उसके हाथ में
एक किताब हो।
या
हल की मूठ।
या
कॉपी के किनारे
लिखा कोई सवाल।

मैंने देखा है
सत्ता
बंदूकों से कम,
सवालों से ज़्यादा डरती है।
वे जानते हैं,
जब एक शिक्षक
बच्चों को
डर के बजाय
सोचना सिखा देता है,
जब एक विद्यार्थी
उत्तर रटने से इंकार कर
प्रश्न पूछने लगता है,
और जब
एक किसान
अपनी मिट्टी का हिसाब
मांगने लगता है,
तब
सिंहासनों की नींव में
धीरे-धीरे
दरार पड़ती है।

क्रांति
नारों से नहीं,
आदमी के भीतर
जागे हुए विवेक से चलती है।
इसलिए
जो अन्याय
और अव्यवस्था के सामने
सबसे पहले खड़ा मिलेगा,
वह अक्सर
कोई शिक्षक होगा,
कोई विद्यार्थी,
या कोई किसान।
बाक़ी लोग
तब तक
भीड़ बने रहेंगे।
जब तक
उन्हें
अपने ही कंधों पर
रखी हुई
व्यवस्था की लाश
दिखाई नहीं देती।

- देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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