बचपन या पचपन
उम्र की गिनती में आज पचपन का पड़ाव है,
पर दिल में अब भी बचपन का वही ठहराव है।
चेहरे पर वक्त की कुछ लकीरें जरूर आई हैं,
मगर आँखों में आज भी वही शरारतें समाई हैं।
कभी मिट्टी में खेलना, कभी बारिश में भीगना,
बिन बात के हँसना और रूठकर फिर से मिलना।
न चिंता कल की थी, न फिक्र किसी आने वाले कल की,
छोटी-सी खुशियों में दुनिया थी अपनी पल की।
पचपन ने बहुत कुछ सिखाया, बहुत कुछ समझाया,
किसे अपना कहना है, किसे वक्त ने दूर कर दिया।
कितने मौसम आए और चुपचाप गुजर गए,
कितने अपने मिले, कितने यादों में उतर गए।
फिर भी जब बच्चों को खेलते हुए देखता हूँ,
तो खुद को उसी पुराने आँगन में पाता हूँ।
मन कहता है—उम्र को बस उम्र मत मान लेना,
अपने भीतर के बच्चे को कभी मत जाने देना।
पचपन की देह में बचपन आज भी जिंदा है,
यही तो जिंदगी का सबसे खूबसूरत परिंदा है।
उम्र चाहे जितनी हो, "महादेव" मुस्कुराते रहिए,
बचपन को दिल में रखिए और पचपन को हँसकर जीते रहिए।
- बृजेश महादेव
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