विद्रोह की भड़क
हल्की सी चिंगारी
और दो पल का जोश
जैसे दबा देगा
सारे अप्रासंगिक विचारों को
जैसे मिटा देगा
सारे मंदाचार को
जिसे समाज ने बस मान लिया
मान लिया हल्के से दबाव में
जैसे भ्रष्टाचार को माना
जैसे देश में उत्पन्न विकार को माना
मग़र मेरे मन में उठ रही
विद्रोह की ललक
अभी हल्की है
जैसे सुनसान गली अब सुरक्षित है
मिले अधिकार भी आरक्षित है
मेरे सवाल मुझे बैठने नहीं देते
मेरे हौसले मुझे उठने नहीं देते
मै देख रहा हूं विकास के असार को
किए वादों के नकार को
खैर अब जब मुकम्मल मिलना चाहिए
मुझे अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए
मेरे मन में उठ रही है
परिवर्तनों की धार
फिर भी मैं खामोश हूं
जैसे कोई क्रांतिकारी बीमार।।
-मौसिन विपु
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