ख्वाबों को सच में जीने दिल तो दीवाना चाहिए।
हक़ की खातिर कम से कम लड़ने तो आना चाहिए।।
पूछकर, लेकर इज़ाजत, आये भी तो क्या आए?
मेहमाँ की तरह बिन बुलाये भी तो आना चाहिए।।
अहले-मोहब्बत को फिरता रहा क्यूँ दर-बदर?
दौड़े-दौड़े इस बला को दर पे ही आना चाहिए।।
पिया के दरबार में हो पाँचों बखत् की हाज़िरी।
और ये मुहब्बत भी ज़रा सा सूफियाना चाहिए।।
मन्नत, दुआ, रहम या फ़रियाद नहीं, ये इश्क़ है।
है इक अदब, अकीदत में सर तो झुकाना चाहिए।।
राह-ए-इश्क में मंज़िल कहां, इक सफ़र है आशिकाना।
इश्क़ को सिज्दे में अब तो ढल ही जाना चाहिए..?
इश्क़ तो है दर-असल इक इबादत, क्यों "सुमन"..?
हम नमाज़ी हैं कि नहीं, ये तो आज़माना चाहिए।।
- चन्द्रकिशोर साहू "सुमन"
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