चन्दन का अंतिम तर्क
अगर ईश्वर पूर्ण है,
तो उसने कुछ बनाया क्यों?
पूर्ण को विस्तार नहीं चाहिए,
तो सृष्टि किस अभाव से आई क्यों?
रचना करना इच्छा है,
इच्छा अपूर्णता की निशानी,
तो या तो ईश्वर पूर्ण नहीं,
या “पूर्णता” बस धार्मिक कहानी।
कहा गया—
“सब कुछ ईश्वर की योजना है”
तो बलात्कार भी योजना?
नरसंहार भी योजना?
या योजना सिर्फ तब तक है
जब तक सवाल न उठे?
अगर वह रोक सकता था—
और रोका नहीं,
तो वह अच्छा नहीं।
अगर वह रोक नहीं सकता—
तो वह ईश्वर नहीं।
इस तर्क से भागने का
कोई रास्ता नहीं,
बस आस्था का धुआँ है
जहाँ तर्क को जलाया जाता है वहीं।
मनुष्य को दोष दिया गया—
“मनुष्य शैतान है”
पर शैतान की संभावना
डिज़ाइन में किसने डाली,
यह सवाल क्यों हर धर्म से बाहर है?
अगर शेर मारे तो जैविकी,
अगर इंसान मारे तो पाप?
तो नैतिकता प्रजाति-आधारित है?
या सुविधा-आधारित हिसाब?
प्रार्थना की महिमा गाई गई—
पर अस्पतालों में
डॉक्टर काम आते हैं,
मंत्र नहीं।
इम्तिहान में पास वही होता है
जो पढ़ता है,
मस्जिद–मंदिर में समय देने से
सवाल हल नहीं होते।
जो नहीं मानते,
वे भी बच्चे पालते हैं,
और जो रोज़ सिर झुकाते हैं,
वे भी कर्ज़ में मरते हैं।
तो फ़र्क कहाँ है?
अगर परिणाम समान हैं,
तो ईश्वर एक भावना है,
तथ्य नहीं, प्रमाण नहीं।
धर्म ने डर दिया,
डर ने अनुशासन,
अनुशासन ने सत्ता,
और सत्ता ने कहा—
“यही ईश्वर का आदेश है।”
यह ईश्वर नहीं था,
यह शासन था।
स्वर्ग–नरक बनाए गए
न्याय के लिए नहीं,
बल्कि सवाल रोकने के लिए।
क्योंकि जो इंसान
मौत से डरता है,
वह ज़िंदा रहते
सब कुछ मान लेता है।
मैंने(चन्दन )ईश्वर नहीं छोड़ा,
मैंने भय छोड़ा है।
मैंने पूजा नहीं छोड़ी,
मैंने सौदा छोड़ा है।
अब मैं अच्छा हूँ
क्योंकि मैं(चन्दन )समझता हूँ,
न कि इसलिए कि
कोई देख रहा है।
और अगर ईश्वर है भी,
तो उसे मेरी पूजा नहीं चाहिए,
उसे मेरी ईमानदारी चाहिए होगी —
अगर वह सच में पूर्ण है।
और अगर नहीं है,
तो भी फर्क नहीं पड़ता,
क्योंकि इंसान को
ईश्वर नहीं,
ज़िम्मेदारी चाहिए थी। ....
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