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मेरा अहंकार कभी चिल्लाया नहीं

                
                                                         
                            मेरा अहंकार
                                                                 
                            

मेरा अहंकार कभी चिल्लाया नहीं,
बस धीरे से कहता रहा—
पहले तुम क्यों बोलोगे?

और मैं…
उसकी बात सुनता रहा।

वह दो दिलों के बीच
खामोशी की दीवारें बनाता रहा,
और उन दीवारों को
आत्मसम्मान कहता रहा।

उसने सिखाया—
झुकना मत,
समझाना मत,
पहला कदम मत बढ़ाना,
चाहे दिल भीतर से
कितनी ही बार पुकारता रहे।

वह कहता रहा—
“तुमने कुछ गलत नहीं किया।”

शायद सच में
मैंने कुछ गलत नहीं किया था।

लेकिन उसने कभी नहीं पूछा
“सही होने की कीमत पर
तुमने क्या खो दिया?”

मेरा अहंकार
हर बहस गिनता रहा,
हर चोट याद रखता रहा,
हर अनकहा शब्द संभालता रहा

मगर उन पलों को नहीं गिना
जिन्हें बचाया जा सकता था।

मैं अपने अभिमान को
इतना अनमोल समझता रहा
कि जिस इंसान से प्रेम था,
उसे धीरे-धीरे
एक स्मृति बनते देखता रहा।

कितना अजीब है—

मैं एक बहस हारने से डरता रहा,
और उसी डर में
एक इंसान हार गया।

मैं माफ़ करना कहने से डरता रहा,
जैसे ये दो शब्द
मुझे छोटा कर देंगे।

आज समझ आता है—

हर “माफ़ करना”
का अर्थ यह नहीं होता
कि “गलती मेरी थी।”

कभी-कभी इसका अर्थ होता है—

तुम मेरे सही होने से
कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे।

मेरा अहंकार मुझे
सीना तानकर खड़ा होना सिखाता रहा,

मगर उसने कभी नहीं सिखाया
कि किसी अपने को
बिना चोट पहुँचाए
कैसे थामा जाता है।

उसने मुझे समझाया
जो पहले बोलेगा,
वही कमजोर होगा।

काश, तब समझ पाता

कभी-कभी सबसे साहसी दिल
वही होता है
जो सबसे पहले बोलता है।

मैंने क्रोध पढ़ा,
आसक्ति पढ़ी,
तृष्णा पढ़ी,
दुःख के कारण पढ़े।

किताबों में समझा,
दर्शन में समझा,
ध्यान में समझा

मगर सबसे बड़ा पाठ
मेरी अपनी ज़िंदगी ने लिखा

ज्ञान तुम्हें नहीं बचा सकता,
अगर तुम्हारा अहंकार
झुकना नहीं जानता।

आज मैं अपने अहंकार से
नफ़रत नहीं करता।

कभी वह मेरा कवच था
अस्वीकार से बचाने वाला,
कमज़ोरी छुपाने वाला,
टूटने से रोकने वाला।

लेकिन कब वह कवच
एक पिंजरा बन गया,
मुझे पता ही नहीं चला।

आज मैं उसी पिंजरे में खड़ा हूँ,
हाथों में वे सारे शब्द लिए
जो कभी कहे ही नहीं गए।

आज भी नहीं जानता
कि एक माफ़ी
हमारी कहानी बदल सकती थी या नहीं।

बस इतना जानता हूँ—

काश, एक बार
मैंने अपने अहंकार की जगह
प्रेम को चुन लिया होता।

क्योंकि कभी-कभी
इंसान इसलिए नहीं छूटता
कि प्रेम कम था।

इंसान इसलिए छूट जाता है
क्योंकि दो दिल
एक-दूसरे के पहले झुकने का
इंतज़ार करते रहते हैं।

और शायद आज
मेरी सबसे बड़ी लड़ाई
अतीत से नहीं,
उससे नहीं,
अपने पछतावे से भी नहीं—

अपने भीतर की उस आवाज़ से है
जो आज भी पूछती है—
“पहले मैं ही क्यों?

और इस बार
मैं उसे जवाब देना चाहता हूँ—

क्योंकि कुछ लोग
तुम्हारे सही होने से
कहीं अधिक कीमती होते हैं…
और कुछ रिश्ते
अहंकार से नहीं
एक कदम झुक जाने से बचते हैं।
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5 घंटे पहले

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