जाने कितने डर कितनी आशंकाएं
कितने दर्द समेटे बैठा हूँ
पर कुछ ही लोग इस दुनिया में
जिनसे मैं कुछ कुछ कहता हूँ
अपने मन के अंतर्द्वंदों को
बस लिखता गीतों और छंदों में
फिर भी ना सब कुछ कह पाता
कि मन उलझा रहता किन फंदों में
भावों को समेटे दरिया सा
बस यूं ही निरंतर बहता हूँ
लहरों के थपेड़ों को हर पल
साहिल के माफिक सहता हूँ
ऐसे ही बस इस जीवन को
अपने से लपेटे बैठा हूँ
जाने कितने डर...।
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