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ना खिलेंगी अब कलियां ना महकेंगी गलियाँ

                
                                                         
                            सब कुछ बिखरता चला जा रहा है
                                                                 
                            
देखो अंधेरा घना छा रहा है
रहेगा अंधेरा ना खिलेगी धूप अब फिर
क्यूंकि अपना तो सूरज बुझा जा रहा है
दिन रात में ना अब कोई फ़र्क़ होगा
ज़मीं आसमां दोनों वीरान होंगे
ना खिलेंगी अब कलियां ना महकेंगी गलियाँ
गुलशन भी अब सब बियाबान होंगे
कैसे बुलाएं अब उस बागबां को
इन्हें छोड़ कर जो चला जा रहा है
देखो अंधेरा...।
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एक महीने पहले

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