अनगिनत ख़्वाहिशों के पीछे
जग भाग रहा है यहाँ वहाँ
इक पल को भी इसको चैन नहीं
बस आँखें मिंचे पड़ा यहाँ
ना ख़बर कि जाना किधर इसे
ना पता ही कि कहाँ रुकना है
बस आँखें मूंदे दौड़ रहा
बेख़बर कि किस हद तक झुकना है
कुछ पा कर भी कहीं ख़ुशी नहीं
होठों पे थोड़ी सी हँसी नहीं
माथे पे शिकन मन में चिंता
साँसें हैं जैसे फँसी कहीं
इस दौर की यही सच्चाई
सब त्याग रहा इंसान यहाँ
अनगिनत ख़्वाहिशों के पीछे...।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X