विवेकी बनने की ठानकर
पूजा के लिए निकला था
बड़ी जल्दी में।
रास्ते में
प्रेमालाप करती बिल्लियों पर
नज़र क्या पड़ी,
विवेक ने वहीं
आँखें बंद कर लीं!
बड़ी मुश्किल से
नज़र हटाकर
स्नानस्थल पहुँचा,
तो वहाँ
छिपकलियों की प्रणय-क्रीड़ा
दिख गई।
विवेक फिर
फिसलकर गिर पड़ा!
किसी तरह
उस दृश्य-दुर्भाग्य को पार कर
पूजा में लीन हुआ ही था
कि एक मच्छर
बेसुरा गीत गाता हुआ
मेरे गाल पर
ऐसा चुम्बन जड़ गया
मानो वह भी
भक्तिभाव में
अपना योगदान देने आया हो!
पूजा समाप्त हुई।
मैं घर लौट आया।
पर हृदय में
एक गंदा समुद्र
ज्वार की तरह
उफनता रहा।
उसकी लहरों की आवाज़ से
अंदर का सारा विवेक
काँपकर भाग गया।
अब क्या बचा?
न विवेक,
न वैराग्य,
न भक्ति...
बस भावना बची है,
और वह भी
ठीक-ठाक भावना नहीं!
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