विषण्ण मन से
सुनता हूँ
बुढ़ापे के खुरों की आहट।
मृतप्राय रेखाएँ ही
अब मेरी
एकमात्र साक्षी हैं।
हत्या के अन्न का
ग्रास निगलते हुए
यह जीवन,
रंगहीनता से
आकाश भर की
आशाओं को भी
ढहा देता है।
क्षणों के निर्दयी दबाव में
मौन ही रोता रहता है
यह आयुष्य,
दुःख और आपदाओं की
धड़कनों से
लबालब भरा हुआ।
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