आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

केवल मेरे अंग जीवित हैं

                
                                                         
                            मैंने
                                                                 
                            
न दोस्ती का अर्थ जाना,
न प्रेम की अग्नि को पहचाना।

इसीलिए
मेरी आँतें ही
अब तक जीवित हैं।

साथ में हैं
मेरी दोनों किडनियाँ,
जो निरंतर श्रम करते करते
धीरे धीरे घिसती जा रही हैं।

शायद मेरे भीतर
बाकी सब कुछ
बहुत पहले ही
मौन हो चुका है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर