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एक व्यंग्य नदी का दर्पण

                
                                                         
                            मलिन नदी में
                                                                 
                            
एक हिरण झुकता है—
अपने ही चौंके हुए चेहरे की तलाश में,
देखते-देखते आँखें थक जाती हैं।

पास ही,
सरकती हुई एक धारा. —भरतपुझा
जल की एक गंजा पड़ी लकीर,
पतली होती हुई,
जैसे स्मृति ही सूख गई हो।

कहीं-कहीं नमी रिसती है,
जैसे दबे हुए लोगों के
अनलिखे आँसू,
धीरे-धीरे बाहर आते हों।

चारों ओर
कुत्ते जमा होते हैं—
सूंघते, घेरते,
एक मौन को कुरेदते हुए।

हिरण की खोजती आँखें
धीरे से बुदबुदाती हैं—
“तत्त्वमसि”—
और फिर
हिरण और कुत्ता
एक-दूसरे में घुलने लगते हैं,
पहचान अपनी ही परछाईं चाटती है।

और नदी—
हाँ, वही नदी—
भूखे आवारा-सी
अपना ही क्षरण चाटती रहती है।

उधर,
जीभों की एक भीड़,
चाट-चाट कर दूसरी भाषा में ढलती,
धीरे-धीरे खिसक जाती है—
एक मौसम में अनूदित होकर,
एक नए आरंभ में,
जहाँ याद भी भूल जाती है
कि वह कभी कुछ और थी।

-------------------------------
मलिन नदी में
एक हिरण झुकता है—
अपने ही चौंके हुए चेहरे की तलाश में,
देखते-देखते आँखें थक जाती हैं।

पास ही,
सरकती हुई एक धारा. —भरतपुझा
जल की एक गंजा पड़ी लकीर,
पतली होती हुई,
जैसे स्मृति ही सूख गई हो।

कहीं-कहीं नमी रिसती है,
जैसे दबे हुए लोगों के
अनलिखे आँसू,
धीरे-धीरे बाहर आते हों।

चारों ओर
कुत्ते जमा होते हैं—
सूंघते, घेरते,
एक मौन को कुरेदते हुए।

हिरण की खोजती आँखें
धीरे से बुदबुदाती हैं—
“तत्त्वमसि”—
और फिर
हिरण और कुत्ता
एक-दूसरे में घुलने लगते हैं,
पहचान अपनी ही परछाईं चाटती है।

और नदी—
हाँ, वही नदी—
भूखे आवारा-सी
अपना ही क्षरण चाटती रहती है।

उधर,
जीभों की एक भीड़,
चाट-चाट कर दूसरी भाषा में ढलती,
धीरे-धीरे खिसक जाती है—
एक मौसम में अनूदित होकर,
एक नए आरंभ में,
जहाँ याद भी भूल जाती है
कि वह कभी कुछ और थी।

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मलिन नदी में
एक हिरण झुकता है—
अपने ही चौंके हुए चेहरे की तलाश में,
देखते-देखते आँखें थक जाती हैं।

पास ही,
सरकती हुई एक धारा. —भरतपुझा
जल की एक गंजा पड़ी लकीर,
पतली होती हुई,
जैसे स्मृति ही सूख गई हो।

कहीं-कहीं नमी रिसती है,
जैसे दबे हुए लोगों के
अनलिखे आँसू,
धीरे-धीरे बाहर आते हों।

चारों ओर
कुत्ते जमा होते हैं—
सूंघते, घेरते,
एक मौन को कुरेदते हुए।

हिरण की खोजती आँखें
धीरे से बुदबुदाती हैं—
“तत्त्वमसि”—
और फिर
हिरण और कुत्ता
एक-दूसरे में घुलने लगते हैं,
पहचान अपनी ही परछाईं चाटती है।

और नदी—
हाँ, वही नदी—
भूखे आवारा-सी
अपना ही क्षरण चाटती रहती है।

उधर,
जीभों की एक भीड़,
चाट-चाट कर दूसरी भाषा में ढलती,
धीरे-धीरे खिसक जाती है—
एक मौसम में अनूदित होकर,
एक नए आरंभ में,
जहाँ याद भी भूल जाती है
कि वह कभी कुछ और थी।
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3 महीने पहले

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