निश्चल, दफ़्तर की कुर्सी पर जड़वत बैठा,
उदास, ऊबा, थका हुआ,
क्षणों की लहरें गिनता हुआ चूर हो रहा हूँ।
सांत्वना खोजती आँखें ऊपर उठती हैं,
ऊपरी खिड़की को भेदती हुई,
पर वहाँ बस एक नारियल-वृक्ष का बिखरा सिर,
सूखा, झुलसा दृश्य,
जो आँखों को और भी प्यासा कर देता है।
पास कहीं समुद्र-गर्जन का आभास,
भयावह बड़बड़ाहट-सी ध्वनि।
डरी हुई आँखें फिर नीचे की खिड़की पर गिरती हैं,
मानो वहीं कुछ राहत मिले।
घना पत्तों का जाल? नहीं,
एक उजड़ा हुआ वृक्ष।
और उसके पास, किसी दलदली मगर का आकार,
फटा हुआ जबड़ा फैलाए
बीभत्स निद्रा में पड़ा है।
ऊपर और नीचे की खिड़कियों के बीच
भटकती रहती हैं आँखें,
भय और वितृष्णा के बुखार में भीगी हुई।
फिर लौटकर टिक जाती हैं फर्श पर।
मेरा चेहरा फिर वैसा ही निर्विकार।
सिर के ऊपर पंखा गूँजता रहता है,
मानो कोई थका हुआ भृंग
अपने टूटे पंखों से मंडरा रहा हो।
और जड़ हो चुकी ज़मीन पर
तीन शब्द पड़े हैं,
मृतप्राय, अंतिम साँस लेते हुए।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X