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सवाल ही रहने दो

                
                                                         
                            तुम्हारे सवालों पर
                                                                 
                            
मैं मौन रहूँगी,
क्योंकि हर सवाल का जवाब
शब्दों में दिया जाए—
ज़रूरी तो नहीं।
कुछ सवाल
दिल की चौखट तक आते हैं,
और वहीं ठहर जाते हैं,
जहाँ जवाब नहीं,
सिर्फ़ एहसास रहते हैं।
तुम पूछोगे—
क्यों बदली हूँ मैं?
मैं मुस्कुराकर चुप रहूँगी।
तुम पूछोगे—
किस बात का दर्द है?
मैं अपनी आँखों में
तुम्हें पढ़ने दूँगी।
तुम पूछोगे—
अब शिकायत क्यों नहीं करती?
मैं शायद इतना ही कहूँगी—
जिसे समझाना पड़े,
उससे शिकायत कैसी?
मैंने बहुत कुछ कहा था कभी,
बहुत कुछ समझाया भी था,
मगर जब शब्दों की कीमत
समझने वाला न दे,
तो खामोशी
सबसे महँगा जवाब बन जाती है।
इसलिए
तुम्हारे सवालों पर
मैं मौन रहूँगी।
न नाराज़गी होगी,
न कोई इल्ज़ाम—
बस एक दूरी होगी,
जो मेरे शब्दों ने नहीं,
तुम्हारी बेरुख़ी ने तय की होगी।
और हाँ,
मेरे मौन को
मेरी कमजोरी मत समझना—
कभी-कभी
इंसान इसलिए चुप होता है
क्योंकि उसके पास
कहने को बहुत कुछ होता है।
- विनीता शाहा
 
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2 घंटे पहले

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