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हम भी बरसों बरस वो सब रिश्ते निभाते थे

                
                                                         
                            हम उस जमाने के नुमाइंदे हैं
                                                                 
                            
घर छोड़ हम जब अनजाने शहर आते थे,
घर से बाहर भी तब परिवार मिल जाते थे।
होटल में ठहरने का रिवाज ना था
बाहर खाने का कोई बाजार न था।
ठहर जाते थे किसी की सादगी देख
अतिथि देवो भव की बस बंदगी देख।
स्नेह से भरा जहां अपना सा इक परिवार था
थाली में बस एक सब्जी रोटी और आचार था।
बड़े मनुहार से अम्मा बैठ पास खिलाती थी
कमी ना खले परिवार की इतना दुलराती थी।
बाबा बगल में अपने चारपाई लगवाते थे
नई आई सबसे अच्छी चादर बिछावाते थे।
जब तक ना मिले कोई ठौर ठिकाना कोई
संकोच न करने की हिदायत भी दे जाते थे।
हम उस जमाने के नुमाइंदे हैं
जब अपने बाहर भी मिल जाते थे।
हम भी बरसों बरस वो सब रिश्ते निभाते थे
छुटकी की शादी में भाई सा फर्ज निभाते थे।
सुन अम्मा की बीमारी हम दौड़े चले आते थे
अनजाने से रिश्तों को हम बरसों निभाते थे।
हम उस जमाने के नुमाइंटे हैं
जब अपने बाहर भी मिल जाते थे।
-बीना राजन मिश्रा
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1 सप्ताह पहले

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