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सब कुछ सरल है, हां सब सहज है

                
                                                         
                            सब कुछ सरल है, हां सब सहज है,
                                                                 
                            
कहां रहीं अब वो पहले सी अनजान राहें
कहां अब तेरी वो पनहिल निश्तेज निगाहें।
अब कहां बनना है किसी और सा तुझे,
ना साबित करना है जमानें को अब तुझे।
तुझे तो बस, अब खुद सा ही बनना है,
चौराहे नहीं, बस वही पुरानी राह चुनना है।
है निर्माता तू स्वयं का, पहचान स्वयं की,
हां, देख वो ऊंचे पहाड़ की गहरी पगडंडी,
तेरे ही कदमों के निशां की है प्रबल साक्षी।
हर कठिन राह है खोज तेरी ही,
हर मुकाम पर पताका तेरी ही।
जाना कहीं नहीं तुझे, बस लौट आना है
अपनी फिर वही गली, वही पगडंडी।
क्यारियों के तेरे हर फूल झूमते मुस्काते,
नाम तेरा ही तो है सारे भंवरें गुनगुनाते,
बांट निहारते फिर वही मकां वही रस्ते।
सब कुछ सरल है हां सब सहज है,
सबसे सुन्दर बस ये ही राह महज है।
-बीना राजन मिश्रा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
22 घंटे पहले

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