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सत्पृच्छा

                
                                                         
                            छोड़ दी मैंने अब सत्पृच्छा।
                                                                 
                            
तथ्यान्वेषी होने की इच्छा।।
बनते जा रहे लोग अनूठे,
सच के डर से बन गए झूठे।
पारदर्शिता पहुँचाती है पीड़ा,
सच्चाई से करते वे घृणा,
बैठे छल का जाल बिछा।
छोड़ दी मैंने......
दिखावेपन से भरी ज़िंदगी,
छद्म इनकी ईश-बंदगी।
दगाबाज़ी करते बनकर मोम,
अहंकार भरा है रोम-रोम।
घृणा करते सुन सद्शिक्षा।
छोड़ दी मैंने......
विश्वासघाती इनका व्यवहार,
भरोसा जाते पल में डकार।
सत्पृच्छा से आता क्रोध उफन,
मुफ़्त में बन जाएँगे दुश्मन,
फिर क्यों माँगूँ सच की भिक्षा?
छोड़ दी मैंने......
यथार्थता के प्रति देख अनिच्छा,
परित्याग दी लेना सत्परीक्षा।
तथ्यान्वेषी होने की इच्छा,
छोड़ दी मैंने अब सत्पृच्छा।
फिर क्यों माँगूँ सच की भिक्षा?
छोड़ दी मैंने......
— समर निःशेष
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 सप्ताह पहले

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