पढ़ न पाओगी बिना डूबे
दर्द का दरिया है किताब नहीं।
मेरे लड़खड़ाहट पर न जा
मैने आंसू पीये हैं शराब नहीं।
दोस्त, दोस्ती होंगी बेहिसाब
पर मै तेरे लिए इंतिखाब नहीं।
जिसके लिये दामन मे कांटे चुभे
खून से रंगे पते थे, गुलाब नहीं।
सपनों ने ही इतना डरा दिया
उजाले में दिखते, ख्वाब नहीं।
मेरे संदेशों को देखती भी नही
तेरी नजर निकृष्ट है नायाब नहीं।
रकीब संग इश्क की रिवायत यूँ बनी
बन चुकी आफताब तुम, माहताब नहीं।
मृग मरीचिका मानूं या मोहरा
तेरे बेवफा चालों का जबाब नहीं।
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