जब से पीने को नशा-पान बना है,
पूरा विश्व ही एक श्मशान बना है॥
नशा-पान सिखाता है बुरी आदतें,
बीमारी व बर्बादी को देता दावतें॥
देता ज़िंदगी में अनेकानेक आघात है,
बीमारी व कुंठा का बहता जलप्रपात है॥
छूना नहीं यारो! चाहे कोई भी नशा हो,
निकला नहीं वह, जो भी नशे में फँसा हो॥
नशाबाज़ जब भी पी, या ले कश रहा है,
पूरी मानवता को ही डंस रहा है॥
(विकल्प 1: मूल भाव के निकट)
चलता-फिरता वह एक ज़हरीला शज़र है,
सच मानिए! वह एक संक्रामक ज़हर है॥
(विकल्प 2: यदि 'शहर' का भाव रखना हो)
चलता-फिरता वह एक ज़हरीला शहर है,
सच मानिए! वह एक संक्रामक ज़हर है॥
एक ज़हर दूसरे ज़हर को जोड़ रहा,
नई पीढ़ियों की कमर यह तोड़ रहा॥
नशे की होड़ से बढ़ रहा व्यभिचार है,
व्यभिचारी, आतंकी कर रहा तैयार है॥
मानवता का अंतिम समय आन पड़ा है,
परिवार व पर्यावरण नतमस्तक खड़ा है॥
जनाब! धूम्रपान छोड़िए, विनती कल की सुनिए,
उसका दिल न तोड़िए, नशा-पान छोड़िए॥
— विजय बहादुर तिवारी 'समर निःशेष'
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