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ये ठीक नहीं भूषण सिंह अन्वित

                
                                                         
                            मेरी हर खुशी में वो शामिल हो, ये अच्छा है,
                                                                 
                            
मगर सिर्फ वही खुशी हो — ये ठीक नहीं।

ये माना कि वो ज़रूरी है ज़िंदगी में,
पर वही ज़िंदगी हो — ये ठीक नहीं।

उसके इश्क़ में डूब जा — एक हद तक सही है,
मगर खुद को डुबाना — ये ठीक नहीं।

वो अपनी जगह है, तू अपनी जगह,
खुद से बढ़कर कोई अफ़साना ठीक नहीं।

किसी के लिए जीना ज़रूरी है, ये माना ‘अन्वित’,
सिर्फ उसके लिए जीना — ये ठीक नहीं।

इश्क़ कर, बेइंतहा कर — तुझे किसने रोका है,
मगर खुद को भुला के — ये ठीक नहीं।

ज़िंदगी दूसरों पे लुटा दे — ये किसने कहा है,
किसी के लिए खुद को मिटाना — ये ठीक नहीं।
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2 महीने पहले

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