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मै तो हूँ !पगला

                
                                                         
                            मैं तो हूँ !पगला,
                                                                 
                            
लिखता हूँ उम्दा,
लोग कहें, “वाह! क्या कहना!”
कलम ही तो है मेरा गहना।

बावरा मन चुन के लाए मोती,
मन-मंदिर में जलाए ज्योति।
एक अक्स मैं करता हूँ पैदा,
आख़िर में करता हूँ मैं सजदा।

दिन-रात गोता लगाता हूँ इन लहरों में,
खोया-खोया-सा रहता हूँ इन शहरों में।
ढूँढ़ता हूँ एक ऐसे हीरो को,
कभी न झुकने वाले ऐसे वीरों को।

नादान मेरा मन क्यों उठाता सवाल,
ढूँढ़ता फिरूँ दिनभर जवाब।
चाँद की दूधिया रोशनी में देखता हूँ अपनी परी को,
आसमान में पंख लगाए उड़ती देखूँ ऐरी सी अपनी परी को।

लिखते तो लोग अजब-अजब हैं,
तराशा हुआ हीरा दिखता बड़ा ग़ज़ब है।
लोग शब्दों में ढूँढ़ें मुझे, यही मेरा सबब है,
लिखता हूँ मैं शान से, यही मेरा अदब है।
-भुनेश्वर अनंत 
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3 घंटे पहले

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