वतन के चमन हैं अब वीरान हो गये
इंसानियत के लहू से श्मशान हो गये
लालच का दामन बढा इस कदर के
खुद घर के मालिक बेईमान हो गये
फ़िरंगियों का खंजर चला जब वतन पे
कहीं हिन्दू तो कहीं मुसलमान हो गये
खौफ़ का है आलम हर गली, कली में
फ़ूल सब चमन के अब वेजुवान हो गये
लुट रहे हैं हर तरफ़ मंदिर ओ मस्जिद
आदमी आदमी से अब परेशान हो गये
हर तरफ़ है फ़ैली बस नफ़रत की आंधी
मजहबी जुनून से इंसान शैतान हो गये
-भास्करानंद झा भास्कर
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