आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वतन के चमन हैं

                
                                                         
                            वतन के चमन हैं अब वीरान हो गये
                                                                 
                            
इंसानियत के लहू से श्मशान हो गये

लालच का दामन बढा इस कदर के
खुद घर के मालिक बेईमान हो गये

फ़िरंगियों का खंजर चला जब वतन पे
कहीं हिन्दू तो कहीं मुसलमान हो गये

खौफ़ का है आलम हर गली, कली में
फ़ूल सब चमन के अब वेजुवान हो गये

लुट रहे हैं हर तरफ़ मंदिर ओ मस्जिद
आदमी आदमी से अब परेशान हो गये

हर तरफ़ है फ़ैली बस नफ़रत की आंधी
मजहबी जुनून से इंसान शैतान हो गये
-भास्करानंद झा भास्कर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर