एक वृत्त से दूसरे वृत्त तक
यात्रा हो जाती है पूर्ण
भले ही किशोर
युवा से प्रौढ
सब कुछ हाथ में होता है
फिर भी कुछ नहीं हुआ होता है
सब कुछ रहता है यथावत
शाश्वत अपूर्ण
बचता है सिर्फ एक निश्चित बिंदु
जीवन की अंतिम शिक्षा
मृत्यु के उस पार भी
फिर से जीने की प्रबल इच्छा...
-भास्करानंद झा भास्कर
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