मेरे कामों का हिसाब देखते हैं,
साहिल में रहकर सैलाब देखते हैं।
जिनको कल हमने तैरना सिखाया था,
आज वही हमें डुबोने का ख़्वाब देखते हैं।
ज़मीं से उठकर जो आसमान तक न पहुँचे,
वो मेरे पंखों में भी आफ़ताब देखते हैं।
आँधियों से कहो ज़रा अदब से चलें,
हम हवाओं का भी मिज़ाज देखते हैं।
हम ख़ामोश हैं तो अपनी हद में रहो,
हम बस उम्र और रिश्तों का लिहाज़ देखते हैं।
-बसंत पंवार प्रजय
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