कैसे बयां करूं मैं अपने जज्बातों को,
संघर्षों से भरी उन काली-काली रातों को।
जब घर से निकला तो मन को एक सपना दिखाया था,
"अफसर बन लौटूंगा", मां-बाप से वादा करके आया था।
किराए के उस छोटे कमरे में, खुद को रोज़ घिसता हूँ,
कभी दाल में पानी, तो कभी पानी में आंसू पीता हूँ।
किताबों की खातिर जब पैसे कुछ कम पड़ गए,
मां ने गहने बेच दिए, जब हालात घर के बिगड़ गए।
उन पैसों से हमने कोचिंग की मोटी फीस भरा,
दिन-रात एक किया, न मुश्किलों से कभी डरा।
खूब करी तैयारी और प्री-मेन्स को पास किया,
पर फाइनल में चूका, तो लोगों ने उपहास किया।
कभी फिजिकल पास किया तो कभी मेडिकल में अटक गया,
प्रतियोगिता की इस दौड़ में, मैं मूल लक्ष्य से भटक गया।
जो अफसर बनने आया था, अब चपरासी का फॉर्म भरता हूँ,
सुनता हूँ लाखों के तानों को, फिर भी पूरे मन से पढ़ता हूँ।
साल-दर-साल कैलेंडर बदले, चेहरे की रंगत खो गई,
बूढ़े पिता की वो लाठी, उम्मीद ताकते-ताकते सो गई।
अंततः एक परीक्षा में मेरे सबसे अच्छे नंबर आए हैं,
खुश था कि पूरे होंगे सपने, जो मां-बाप ने सजाए हैं।
शुक्र अदा किया भगवान का, कि अंत में सब कुछ ठीक हुआ,
पर तभी खबर आई कि "वो पेपर भी फिर से लीक हुआ!"
एक पल में मेरे सारे सपने टूट-टूट कर चकनाचूर हुए,
देखे थे जो ख्वाब आंखों से, वो पल में हमसे दूर हुए।
वो उम्र की सीमा का ढलना, वो आंखों के आगे अंधेरा छाना,
कोई कैसे समझेगा भला, इस जीते-जी मर जाने का पैमाना?
अब तो हटाओ ऐसे भ्रष्टों को, जो पेपर लीक कराते हैं,
चंद पैसों के लालच में जो युवाओं के सपनों को खा जाते हैं,
हां, चंद पैसों के लालच में "बसंत", जो युवाओं के भविष्य को खा जाते हैं।
— बसंत पंवार 'प्रजय'
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