झूमत गावत नाचत हैं सब,
सावन में हमका दुःख भारी।
दूर गये पिय हैं जब से सखि,
सेज हमार लगे चिनगारी।
सूखि गई तन की फसलें,
इत बारिश में सगरों हरियारी।
कंत बिना सब व्यर्थ भयो,
अब कौन भरै हमका अकवारी।।१।।
- बजरंगी लाल
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