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संग-ए-मरमर पर...

                
                                                         
                            संग-ए-मरमर पर मोहब्बत का ये शाहकार देख।
                                                                 
                            
इश्क़ की सदियों से ज़िन्दा दास्ताँ-ए-यार देख।

एक तन्हा दिल ने की तामीर ऐसी दास्ताँ,
पत्थरों में साँस लेता इश्क़ का संसार देख।

हुस्न ने पत्थर को भी एहसास बख़्शा इस तरह,
बोलता ख़ामोशियों में इश्क़ का इज़हार देख।

मौत भी जिस इश्क़ को फ़ानी बना पाई नहीं,
ताज के पत्थर में उसका आज भी दीदार देख।

जिस को मिटा न पाया कभी गर्दिश-ए-अय्याम भी,
वक़्त के सीने पे उसके इश्क़ के आसार देख।

ताज की जानिब बढ़े तो फ़ासले मिटते गए,
संग-ए-मरमर में ढला सदियों का ये इकरार देख।

पूछना हो इश्क़ का मतलब तो 'अज़हर' ताज से,
संग-ए-मरमर में धड़कता एक ज़िंदा प्यार देख।

- अज़हर साबरी
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2 महीने पहले

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