इस दौर में जज़्बात का सम्मान बचा क्या?
बिकने से जो रह जाए, वो ईमान बचा क्या?
नफ़रत की हवाओं में वो, अरमान बचा क्या?
मज़हब तो बहुत ज़िंदा हैं, इंसान बचा क्या?
दौलत की तराज़ू में हर एहसास भी तौला,
जज़्बात की क़ीमत का कोई मान बचा क्या?
चेहरों पे फ़क़त झूठ के पर्दे हैं पड़े अब,
ख़ुद से ही मुलाक़ात का इम्कान बचा क्या?
सब छीन लिया वक़्त की इस तेज़ हवा ने,
बचपन का वो हँसता हुआ मैदान बचा क्या?
तारीख़ ने हर दौर का क़िस्सा तो लिखा है,
इंसान के हिस्से में मगर मान बचा क्या?
इंसाफ़ के दर पर भी सियासत का है पहरा,
मज़लूम की फ़रियाद का इम्कान बचा क्या?
किस्तों में बिक रहा है यहाँ हर कोई 'अज़हर',
सौदे से जो रह जाए, वो इंसान बचा क्या?
- अज़हर साबरी
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