जो थम गई है उसे फिर गुज़ार कर देखें।
चलो ये ज़िंदगी फिर से सँवार कर देखें।
किसी पे फिर से ज़रा ऐतबार कर देखें,
चलो ये राह मोहब्बत से पार कर देखें।
जो दर्द उम्र ने चुपके से वार कर रक्खे,
चलो उन्हें भी हँसी में गुज़ार कर देखें।
ग़ुबार वक़्त का आँखों पे जम गया होगा,
चलो नज़र को ज़रा फिर सँवार कर देखें।
सफ़र में धूप बहुत है तो रुक भी जाएँ ज़रा,
शजर की छाँव में कुछ पल गुज़ार कर देखें।
ये दिल का शहर जो मुद्दत से वीराँ बैठा है,
चलो किसी की दुआ से बहार कर देखें।
बहुत सँभाल के रक्खा है दिल को मुद्दत से,
चलो किसी पे इसे भी निसार कर देखें।
नतीजा जो भी हो, साहिल पे कब तलक बैठें,
ज़रा सफ़ीना समुंदर के पार कर देखें।
- अज़हर साबरी
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