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हिम्मत अब दिखाता कौन है...

                
                                                         
                            हर्फ़-ए-हक़ कहने की हिम्मत अब दिखाता कौन है।
                                                                 
                            
मस्लहत के दौर में सच को बचाता कौन है।

आईनों पर गर्द है, चेहरों पे चेहरे हैं यहाँ,
अपना अस्ली रुख़ ज़माने को दिखाता कौन है।

लफ़्ज़ सबके पास हैं, एहसास लेकिन कम हुए,
दर्द को तहरीर की सूरत में लाता कौन है।

बिक रहे हैं हर तरफ़ जज़्बात सिक्कों में यहाँ,
प्यार की अनमोल दौलत को बचाता कौन है।

हर कोई मसरूफ़ है अपनी ही धुन में इस क़दर,
दूसरों की राह से काँटे हटाता कौन है।

रास्तों पर भीड़ तो चलती है साए की तरह,
गिर पड़े जो राह में उसको उठाता कौन है।

राह में तो काफ़िले मिलते हैं अक्सर हमसफ़र,
वक़्त की दुश्वारियों में साथ आता कौन है।

रंजिशों की धूप में रिश्ते बिखर जाते हैं यूँ,
उम्र भर का साथ दुनिया में निभाता कौन है।

महफ़िलों में मुस्कुराना तो हुनर है आज का,
तन्हाई में बैठ कर आँसू बहाता कौन है।
- अज़हर साबरी
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3 महीने पहले

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