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दिल के ज़ख़्मों की...

                
                                                         
                            दिल के ज़ख़्मों की ज़माने से हिफ़ाज़त करना।
                                                                 
                            
हम ने सीखा है ख़मोशी से इबादत करना।

हमको आया ही नहीं दिल से बग़ावत करना,
आप ने सीखा कहाँ से ये अदावत करना?

उम्र भर जिस पे लुटाई थी मुहब्बत अपनी,
उसने सिखला दिया है ख़ुद को मलामत करना।

जिसको समझा था सहारा, वही पत्थर निकला,
फिर भी सीखा नहीं पत्थर से शिकायत करना।

दिल की उजड़ी हुई बस्ती में कभी आकर देख,
कितना मुश्किल है उमीदों की हिफ़ाज़त करना।

तेरी यादों ने अता की है मुझे सब्र-ए-जमील,
वरना सीखा न था ज़ख़्मों की इबादत करना।

ज़हर पीने का हुनर तुझ से जो सीखा 'अज़हर',
छोड़ बैठे हैं ज़माने से शिकायत करना।

- अज़हर साबरी
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2 दिन पहले

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